वो इक क्या वाक़िआ' था याद होगा
तुम्हें हम से गिला था याद होगा
उदासी इस क़दर क्यूँ रिस रही है
ख़ुशी का इक समा था याद होगा
न दिल रह पाएगा इन बंदिशों में
तुम्हारा तज़्किरा था याद होगा
मिलो तुम आज फिर उस खंडहर में
वहाँ कुछ वास्ता था याद होगा
परिंदों को क़फ़स में देख कर यूँ
शजर तन्हा खड़ा था याद होगा
तुम्हारे इश्क़ में जो रात भर यूँ
वो लड़का जागता था याद होगा
तुम्हीं को इल्म होगा उस ग़ज़ल का
अरे! क्या क़ाफ़िया था, याद होगा
कहाँ तुम खो गए आख़िर, जो दिल की
गली का रास्ता था याद होगा
— Das Kanpuri















