अगर उस रात तू बस्ती नहीं आती तो अच्छा था
अगर उस रात हम को नींद आ जाती तो अच्छा था
अना ने राख कर डाला हमारे घर मकानों को
अगर हम ने मुआफ़ी माँग ली होती तो अच्छा था
इशारों में मुहब्बत का फ़साना कह दिया मैं ने
इशारे-बाज़ी तुम को भी समझ आती तो अच्छा था
हिफ़ाज़त करने वाले ही उतर आए हैं वहशत पर
मुहब्बत गर किसी के काम आ पाती तो अच्छा था
ख़ुशी मेरी तबीअत के लिए अच्छी नहीं यारों
उसे मिल कर उदासी और बढ़ जाती तो अच्छा था
— Daksh Sharma















