अपने ही हल्क़ा-ए-अहबाब में मरता हुआ मैं
सख़्त तन्हाई के गिर्दाब में मरता हुआ मैं
ग़नी होने के अबस ख़्वाब में मरते हुए तुम
साहिब-ए-ज़र के अबस ख़्वाब में मरता हुआ मैं
जिसका उन्वाँ है क़लक़ ज़ीस्त वो अफ़साना है
और अफ़साने के हर बाब में मरता हुआ मैं
— Daqiiq Jabaalii















