वो आन जिस में उस अत्यब से बात करता हूँ

गुमान होता है मैं रब से बात करता हूँ

ये लफ़्ज़-ओ-लहजा हलावत भरा है तेरे लिए
मैं औरों से कहाँ इस ढब से बात करता हूँ

हाँ उस की बातों से होता है दस्तियाब सुकून
प वो समझता है मतलब से बात करता हूँ

तू तो तबीयत-ए-बस्ता से मेरी वाक़िफ़ है
मैं खुल के थोड़ी न यूँ सब से बात करता हूँ

शब-ए-सियह है क़रीं तज़किरे को कोई नहीं
सो माह-ओ-चर्ख-ए-मकौकब से बात करता हूँ

न जाने बात लगी क्या वो हो गए चुप जबकि
'दक़ीक़' मैं सफ़ा-मशरब से बात करता हूँ

— Daqiiq Jabaalii

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