
गिराँ थी क़ल्ब-ए-मुफ़क्किर पे खोखली गुफ़्तार
इसी लिए तो न ताख़ीर तक चली गुफ़्तार
हम अपने दिल का शग़ब दिल में रख के लौट गए
कि कर के ख़ुश थे अहिब्बा सड़ी गली गुफ़्तार
— Daqiiq Jabaalii
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