जानिब-ए-मंज़िल यूँँ चलकर देखना
आप अपने को बदलकर देखना
लोग दुश्मन आपके हो जाएँगे
चाँद की ख़ातिर मचलकर देखना
सामने कितनी भी हों दुशवारियाँ
अपनी ख़ुद्दारी पे चलकर देखना
मंज़िलें आसाँ सभी हो जाएँगी
बस इरादों को बदलकर देखना
आदमी का आप जंगल पाओगे
भीड़ में घर से निकलकर देखना
आज नज़रों पर भी हैं पहरे बहुत
जब भी देखो तुम संभलकर देखना
पंख लग जाएँगे ख़ुशियों को 'धरम'
वासनाओं को कुचलकर देखना
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