gham ka tamasha ya kiya tha sach ka hi iqraar yaar | ग़म का तमाशा या किया था सच का ही इक़रार यार

  - "Dharam" Barot

ग़म का तमाशा या किया था सच का ही इक़रार यार
जो भी किया था अपनों को करना नहीं था वार यार

बच्चे मेरे हो तेरे जैसे कहता हूँ हर बार ये
इससे ज़ियादा क्या ही होगा तेरा मेरा प्यार यार

तू देख कर भी मिल नहीं पाता तेरा ग़म है मगर
इससे बुरा था वक़्त लिख कर देख थोड़े तार यार

ये बैठ कर रो लेने वाला काम सच में अच्छा है
रखकर घुटन अंदर ही अंदर मरता कितनी बार यार

हम लोकशाही में दिखावा अच्छे से कर लेते हैं
पचती नहीं सच में किसी को होती है जब हार यार

माँ-बाप से मिलती दुआओं का ही है सारा असर
कर देता हूँ हर इक मुसीबत चुटकी में ही पार यार

  - "Dharam" Barot

Father Shayari

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