जैसा मैं ने चाहा था वैसा नहीं था

बातें फिर भी ठीक थी लहजा नहीं था

मैं ने भी उस को नहीं देखा पलट कर
और उस ने भी मुझे रोका नहीं था

एक तो वो भी किसी को चाहती थी
और अच्छा मैं उसे लगता नहीं था

क्या सितम है तुम पे ग़ज़लें लिख रहें हैं
हम को ये दुख तो कभी लिखना नहीं था

उस
में उतरा तो हुआ मालूम मुझ को
वो कुआँ तो था मगर गहरा नहीं था

दूसरों के तो हमेशा आया है काम
वो जो अपना ध्यान भी रखता नहीं था

— Dileep Kumar

More by Dileep Kumar

Other ghazal from the same pen

See all from Dileep Kumar →

Dard Shayari

Shers of dard.

All Dard Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling