यही है आरज़ू पर्दा नशीं की दीद हो जाए
ग़रीबों का भला हो और हमारी ईद हो जाए
पुराने यार को छोड़ा नए इस यार पर लिक्खा
कि अपनी शा'इरी थोड़ी बहुत तज्दीद हो जाए
हमारे साथ सारे यूँंँ भी चलते हैं न जाने कब
शबों का ये सितारा सुब्हों का ख़ुर्शीद हो जाए
वो अपनी मुस्कुराहट को दिखाती यूँंँ है चलते वक़्त
कि मस्नद शाह को हासिल न हो उम्मीद हो जाए
हमारी बस ख़ुशी पर नुक्ता चीनी तो ग़लत है नहमारे "दर्द" पर भी तो कभी तन्क़ीद हो जाए
— Divyansh "Dard" Akbarabadi















