zindagi mazhab dosti aur pyaar ke qabil nahin | ज़ीस्त मजहब दोस्ती और प्यार के क़ाबिल नहीं

  - Gaurav Singh

ज़ीस्त मजहब दोस्ती और प्यार के क़ाबिल नहीं
यानि मुर्शद हम किसी क़िरदार के क़ाबिल नहीं

हम सरासर सच उगलते हैं किसी भी बात पर
हम सियासत के किसी दरबार के क़ाबिल नहीं

एक जानिब बीवी बच्चे एक जानिब वालिदैन
दिल मेरा आँगन है पर दीवार के क़ाबिल नहीं

ज़िंदगी में कुल मेरे दो चार ही तो लोग हैं
सच कहूँ तो मैं इन्हीं दो चार के क़ाबिल नहीं

खोल खिड़की देख बाहर हम खड़े हैं आस में
ये बता क्या हम तेरे दीदार के क़ाबिल नहीं

अब जो हमने प्यार का इज़हार कर डाला है तो
अब हमारी ज़िन्दगी इतवार के क़ाबिल नहीं

कोई भूखा मर गया है गर सड़क पर छोड़िये
इस समय तो ये ख़बर अख़बार के क़ाबिल नहीं

आप मासूमों के गर्दन काटते हैं काटिये
मेरी गर्दन आपके तलवार के क़ाबिल नहीं

देश की सरकार नाक़ाबिल है ऐसा मत कहो
ये भी हो सकता है हम सरकार के क़ाबिल नहीं

हम हैं नकली मीर हमसे शे'र सुनिये दोस्तों
ये ज़माना मीर के अश'आर के क़ाबिल नहीं

  - Gaurav Singh

Deshbhakti Shayari

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