हमें तो ज़िंदगी से भी निभाना था
जो अब तक याद है उस को भुलाना था
तू ने बस पैरहन ही बदला है सय्याद
परिंदों से क़फ़स भी तो छुपाना था
घुमाता ही रहेगा चाक पर मुझ को
मिरा अब कुछ तो कूज़ा-गर बनाना था
— Gulfam Ajmeri
जो अब तक याद है उस को भुलाना था
तू ने बस पैरहन ही बदला है सय्याद
परिंदों से क़फ़स भी तो छुपाना था
घुमाता ही रहेगा चाक पर मुझ को
मिरा अब कुछ तो कूज़ा-गर बनाना था
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