तू अगर जो दिवानी नहीं लग रही
फिर मुझे भी तू अच्छी नहीं लग रही
लाख रो कर तू मुझ को मनाए मगर
अब तेरी बात सच्ची नहीं लग रही
उस ने बोसे पे हामी भी भर ली है आज
इस ख़ुशी में तो खिड़की नहीं लग रही
हिज्र में मेरे आँसू नहीं रुक रहे
और ज़ख़्मों पे पट्टी नहीं लग रही
अब तू क्या जाने उस सूखे दरिया का दुख
जिस के साहिल से कश्ती नहीं लग रही
— Gulfam Ajmeri















