चाँद को अपने पकड़ में कर चुकी है
चाँद की रौनक जकड़ के मर चुकी है
याद रहते थे जिसे तुम मुँह ज़बानी
याद वो तुम से बिछड़ के मर चुकी है
तोड़ देता है नई कलियाँ मसलकर
यार तेरी रूह सड़ के मर चुकी है
रात जब चुभने लगे तो ये समझ लो
आशिक़ी तुम को पकड़ में कर चुकी है
— Subrat Tripathi















