एक वो ही नहीं ग़म ज़दा है
दुनिया में और भी दूसरा है
तुम महोब्बत का अब सोचती हो
जब मिरी सम्त इक क़ाफ़िला है
लोग पहले मोहब्बत का सोचे
फिर ये सोचे कि क्या फ़ाएदा है
मर्द चाहे कहे कुछ भी लेकिन
हुस्न के आगे क्या टिक सका है
चाहते हो अ
गर कुछ भी पाना
छोड़ दो कौन क्या सोचता है
ऐ शजर काटने वाले तुम ने
ये न देखा कि इक घोंसला है
ये हमारी उदासी है जिस ने
उस से अबतक रखा राब्ता है
— Kumar gyaneshwar















