होश सबके ठिकाने लगेंगे
इश्क़ जब आज़माने लगेंगे
तुम को भी लगता है सब नया कुछ
तुम को भी सब पुराने लगेंगे
बाप की क़द्र आती समझ तब
बेटे जब ख़ुद कमाने लगेंगे
यूँ समझने की हम को न सोचो
तुम को इस
में ज़माने लगेंगे
देख ले कोई आँखें तुम्हारी
आग दरिया बुझाने लगेंगे
उस के छू लेने के बा'द यारों
ज़ख़्म सारे सुहाने लगेंगे
उस गली में जहाँ घर तुम्हारा
लोग सजदे को जाने लगेंगे
जितनी आसानी से खुलते थे हम
उतने अब शाख़साने लगेंगे
— Kumar gyaneshwar















