chal rahein hain magar koi manzil nahin | चल रहें हैं मगर कोई मंज़िल नहीं

  - Hasan Raqim

चल रहें हैं मगर कोई मंज़िल नहीं
दिल ये घर लौटने पे भी माइल नहीं

इन चराग़ों की कोशिश उजाले की है
यूँँ तो सूरज का कोई मुक़ाबिल नहीं

ग़म ये है उसको अपना समझता था मैं
और वो ही मेरे ग़म में शामिल नहीं

उसको पाने में भी मुश्किलें हैं बहुत 'इश्क़ होना ही बस एक मुश्किल नहीं

तुम नहीं तो कोई और होगा मेरा
इस समंदर का बस एक साहिल नहीं

ज़िंदगी में सब ही कुछ मिला है मगर
एक वो शख़्सही मुझको हासिल नहीं

  - Hasan Raqim

Valentine Shayari

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