सोचता हूँ ये भी कैसी दिल्लगी अच्छी लगी
वो भी अच्छा और उसकी बेरुखी अच्छी लगी
क्या मुसीबत है तिरे जाने पे तेरा इंतज़ार
और आने पे तेरे, तेरी कमी अच्छी लगी
वो ग़मो के साए में रहते रहे हैं इसलिए
रौशनी होते भी उनको तीरगी अच्छी लगी
कौन है राज़ी फ़रेब-ए-गर्दिश-ए-अय्याम से
मौत से पहले किसे ही ज़िंदगी अच्छी लगी
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