ghazab chaltaa hai sabki zeest ka khaata | ग़ज़ब चलता है सबकी ज़ीस्त का खाता

  - Deepankar

ग़ज़ब चलता है सबकी ज़ीस्त का खाता
मुकम्मल कुछ के कोई कुछ नहीं पाता

मैं अपनी माँ का प्यारा आँख का तारा
कभी उस शख़्स को क़तरा नहीं भाता

वो मेरी जान का दुश्मन है लेकिन वो
मुझे पाता है पर ख़ंजर नहीं पाता

दुआ छोड़ी नहीं जिसके लिए इक भी
उसी से एक दिन छोड़ा गया नाता

नहीं देखा किसी नौ रूप वाली को
मिरी ख़ातिर रही बस एक हैं माता

मुजाविर 'इश्क़ अक्सर 'दीप' रो रो कर
किसी इज्ज़त की ख़ातिर हार है जाता

  - Deepankar

Anjam Shayari

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