ग़ज़ब चलता है सबकी ज़ीस्त का खाता
मुकम्मल कुछ के कोई कुछ नहीं पाता
मैं अपनी माँ का प्यारा आँख का तारा
कभी उस शख़्स को क़तरा नहीं भाता
वो मेरी जान का दुश्मन है लेकिन वो
मुझे पाता है पर ख़ंजर नहीं पाता
दुआ छोड़ी नहीं जिसके लिए इक भी
उसी से एक दिन छोड़ा गया नाता
नहीं देखा किसी नौ रूप वाली को
मिरी ख़ातिर रही बस एक हैं माता
मुजाविर 'इश्क़ अक्सर 'दीप' रो रो कर
किसी इज्ज़त की ख़ातिर हार है जाता
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