दिली दीदार की चाहें बढ़ाते जा रहे हैं
तुम्हें ही सोच आँखों को सताते जा रहे हैं
गुज़ारी है तुम्हारे बा'द मैं ने शाम जो भी
ख़ुदी को आज भी क्यूँ आज़माते जा रहे हैं
हमारे साथ जो भी हैं अभी वो बा'द में भी
अकेले आँख से आँसू बहाते जा रहे हैं
लगाए घूमते हैं जो लबों पे आज बीड़ी
जवानी को धुयें में ही उड़ाते जा रहे हैं
— Deepankar















