हमीं रूठे मगर उन को मनाया जा रहा है
जनाज़ा पर मोहब्बत का उठाया जा रहा है
वो जिन के आँख बादल बन बरसते हैं यहाँ पर
मुसलसल तो उन ही से जग हँसाया जा रहा है
कई बाकी अधर्मी हैं अभी भी इस जहाँ में
तभी तो कृष्ण को वापस बुलाया जा रहा है
जो हमनें यार रोके थे बिरह में काम आने
वहीं से आज आँखों को रुलाया जा रहा है
अभी हम उठ रहे हैं और उठने की तलब है
अभी हम को है जबरन क्यूँ गिराया जा रहा है
यहाँ उड़ते हुए से 'दीप' सब को ही ख़लिश है
जकड़ धागे पतंगों को उड़ाया जा रहा है
— Deepankar















