मुसाफ़िर थे बिना ख़्वाहिश ठिकाना छोड़ आए
गली की चाहतों का वो फ़साना छोड़ आए
बनें हम राम निकले इस दफ़ा हैं जो गुरुकुल
पिता वासू यशोदा का दिवाना छोड़ आए
कभी झंकार बारिश की कभी बादल कि धमकी
नगर की शाम वो मौसम सुहाना छोड़ आए
हुई तकते हुए इक शख़्स को है रात से दिन
मगर वो बात वो तस्वीर-ख़ाना छोड़ आए
— Deepankar















