मेरी आँखों के समुंदर में भी खो सकता है
जिस में तू पूरे बदन को भी भिगो सकता है
तू मुझे यूँ नज़र-अंदाज़ न कर क्या मालूम
जो तुझे चाहिए वो मुझ में भी हो सकता है
ये भी हो सकता है तू ख़ुश रहे मेरे अंदर
और अंदर के ही अंदर भी तू रो सकता है
या तो कर सकता है हर दिन नए रस्तों का सफ़र
या तो फिर ओढ़ के चादर तले सो सकता है
ज़ख़्म नेमत है ग़ज़ल में इसे कर के तब्दील
किसी के दिल में भी नग़मात पिरो सकता है
— Aadi Ratnam















