जो ले बाप की अर्थी चल सकता है
वो फिर पत्थरों को भी मल सकता है
जो चाहूँ तो दुश्मन मिटा दूँ मगर
मुहब्बत से पत्थर पिघल सकता है
हँसो नइँ मुझे धूप में देख कर
ये मौसम कभी भी बदल सकता है
— Irshad Siddique "Shibu"
वो फिर पत्थरों को भी मल सकता है
जो चाहूँ तो दुश्मन मिटा दूँ मगर
मुहब्बत से पत्थर पिघल सकता है
हँसो नइँ मुझे धूप में देख कर
ये मौसम कभी भी बदल सकता है
Other ghazal from the same pen
Shers of mohabbat shayari collection.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling