khudaaya ho raha tere nagar men kya | ख़ुदाया हो रहा तेरे नगर में क्या

  - Chandan Sharma

ख़ुदाया हो रहा तेरे नगर में क्या
लगेगी आग बस मुफ़लिस के घर में क्या

ख़ुदी का जिस्म ढ़ोना जब लगे मुश्किल
रखें सामान आख़िर फिर सफ़र में क्या

मुहब्बत है मुझे इन स्याह रातों से
बसी है रातों में तू इस सहर में क्या

मेरा क़ासिद भला मायूस क्यूँ है आज
ख़बर आई नहीं उनकी ख़बर में क्या

जिधर देखे, उधर ही क़त्ल होते हैं
न जाने है बला उसकी नज़र में क्या

जुदा होते हुए मर जाते तो अच्छा
तेरे बिन भी बसर है, पर, बसर में क्या

तपिश कैसी, धुआँ कैसा, हुआ क्या है
कहीं कुछ जल रहा मेरे जिगर में क्या

मुहब्बत दर-बदर ले जायेगी कब तक
कटेगी 'उम्र सारी रहग़ुजर में क्या

वफा़ कर के ख़सारा हो गया शायद
निभा कर मैं मुहब्बत हूँ ज़रर में क्या

ये नफ़रत ही दिखाई दे जो हर सू अब
मुहब्बत मर गई है हम बशर में क्या

कभी जंगल कभी सहरा फिरो 'जाज़िब'
बने हो क़ैस तुम यूँँ बैठे घर में क्या

  - Chandan Sharma

Aag Shayari

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