मैं तो बस उजड़े हुए दिल में बसेरा चाहता हूँ
जब यहाँ तामीर हो इक तेरा कमरा चाहता हूँ
मुझ को कैसी भी रिआयत अच्छी लगती ही नहीं
ज़ख़्म जब कोई मिले तो सिर्फ़ गहरा चाहता हूँ
ज़िंदगी से तो बहुत झगड़ा किया है मैंने अब तक
अच्छा बनने के लिए अब ख़ुदस झगड़ा चाहता हूँ
ज़ख़्म भी है ग़म भी है रुसवाई भी है इसलिए मैं
मौत जब आए तो तन्हाई का सहरा चाहता हूँ
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