आख़िरी आशिक़ी मय-कशी रह गई
ज़िंदगी भर में जब तीरगी रह गई
है मिला कुछ घड़ी का सुकूँ और फिर
कुछ घड़ी पास में आख़िरी रह गई
हो गया ख़त्म सब जो भी था दरमियाँ
जब फ़क़त दरमियाँ बे-रुख़ी रह गई
ख़ामुशी से अलग हो गए वक़्त पर
वक़्त की धार में आशिक़ी रह गई
हश्र ये पेड़ को काटने से हुआ
ये ज़मीं बीच से खोखली रह गई
तू मिरी ज़िंदगी बन गई है मगर
जो मिरा ख़्वाब थी शा'इरी रह गई
— Aashish kargeti 'Kash'















