"सुनो कश"
वो जो तुम्हारी जान है 'कश'
वो जो तुम्हारा मान है 'कश'
हम ने दिया है ग़ौर उस पर
कल को तुम्हारी जान लेगी
जीने के ही दौरान लेगी
जाने के उस के बा'द उस को
भर उम्र कर के याद उस को
जीना भुला के इक नगर में
सालों रहेगा छिप के घर में
साँसों पे तेरा बस न होगा
महबूब टस से मस न होगा
बस्ती रहेगी ख़ाक तेरी
चलती रहेगी साँस तेरी
जीते रहोगे मरते मरते
हर पल उसी को याद करते
उस का यही अंदाज़ है 'कश'
अब से बना लो उस से दूरी
तुम बात मेरी मान लो 'कश'
— Aashish kargeti 'Kash'















