बहुत दिनों मैं किसी के क़यास में भटका
था एक क़तरा सो दरिया की आस में भटका
मुसीबतों के पहाड़ों को पार कर के भी
वो कोहकन भी किसी की ही प्यास में भटका
तमाम शहर ने खोले थे घर के दरवाज़े
'अजब ये ग़म था, फ़क़त मेरे पास में भटका
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