maut ko zindagi samjhte hain | मौत को ज़िंदगी समझते हैं

  - Khalid Azad

मौत को ज़िंदगी समझते हैं
दर हक़ीक़त सही समझते हैं

मेरे ग़म को कभी नहीं समझे
वो जो मेरी हंसी समझते हैं

हम से दरिया की निभ नहीं सकती
हम अलग तिश्नगी समझते हैं

तेरी दुनिया ने दी बहुत ठोकर
इसलिए चेहरगी समझते हैं

ख़्वाब उस
में ही मेरे पलते हैं
लोग क्यूँ झोपड़ी समझते हैं
'इश्क़ पहले पहल समझते थे
अब फक़त दिल्लगी समझते हैं

तब कहीं उनको मैं समझ आया
जब से वो शाइरी समझते हैं

अपने हाथों को खींच लेते हैं
बच्चे अब मुफ़लिसी समझते हैं

  - Khalid Azad

Zindagi Shayari

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