
तुम जो चाहो तो सर-ए-आम भी हो सकता है
मसला वरना ये गुमनाम भी हो सकता है
न मैं यूसुफ हूँ न मिस्र के बाज़ार यहाँ
क्या मेरा ख़्वाब यहाँ नीलाम भी हो सकता है
— Khalid Azad
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