aaj giraa hai aankhoñ se ye ashq hamaara kaagaz par | आज गिरा है आँखों से ये अश्क़ हमारा काग़ज़ पर

  - Divya 'Kumar Sahab'

आज गिरा है आँखों से ये अश्क़ हमारा काग़ज़ पर
अश्क़ उठाता है फिर सागर और किनारा काग़ज़ पर

हाथ पकड़ कर हम दोनों ने फेरे सात लिए पूरे
आज बहा आँखों से ये भी पाक नज़ारा काग़ज़ पर

चाँद उतारा था काग़ज़ पर मैंने अंबर से फिर बस
आकर गिरता है दीवाना एक सितारा काग़ज़ पर

चंदा सूरज बादल तारे सागर पर्वत दिल मेरा
आज बनाया है इन सब ने तेरा शरारा काग़ज़ पर

क़िस्मत में तुमको लिखना था पर बिछड़ा हूँ तुम सेे मैं
आज लिखा ख़ुद को फिर जानाँ सिर्फ़ तुम्हारा काग़ज़ पर

अब क्या बोलूँ और क्या लिख दूँ सिर्फ़ मोहब्बत है तुझ सेे
देख इधर मैं करता हूँ फिर आज इशारा काग़ज़ पर

  - Divya 'Kumar Sahab'

Chaand Shayari

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