मैं तुझे नायाब लिख दूँ कुछ मगर होगा नहीं
ख़ुद को फिर बेताब लिख दूँ कुछ मगर होगा नहीं
तेरी आँखों में बसूँ मैं तेरे दिल में घर करूँँ
ख़ुद को तेरा ख़्वाब लिख दूँ कुछ मगर होगा नहीं
ध्रुव तारा बन मैं चमकूँ तेरी ज़ुल्फ़ों में कभी
फिर तुझे महताब लिख दूँ कुछ मगर होगा नहीं
कौन सी अब मैं दुआ या फिर दवा लाकर करूँँ
आँखों से सैलाब लिख दूँ कुछ मगर होगा नहीं
थाम लो आकर कहीं से सिर्फ़ इक हसरत यही
आग को मैं आब लिख दूँ कुछ मगर होगा नहीं
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