
ये रिश्तों से बना है घर ये ईटों का मकाँ कुछ है
मुझे ये छत बताती है पिता का सायबाँ कुछ है
बुलंदी पर पहुँच माता पिता को छोड़ देते हैं
अरे पागल धरा जब तक तभी तक आसमाँ कुछ है
— Divya 'Kumar Sahab'
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