ये न था कि हसीं नहीं थे हम
बारहा बस हमीं नहीं थे हम
ज़िंदगानी हुई अदा ऐसे
पीठ-पीछे यक़ीं नहीं थे हम
मुफ़्लिसी सब उड़ा गई मंज़िल
यार हासिल कहीं नहीं थे हम
इक क़ज़ा भी अता नहीं मुझ पे
किस-क़दर मह-जबीं नहीं थे हम
नाज कह कर हुआ सही कामिल
मर्द भी जा-नशीं नहीं थे हम
— Kunu















