घर के जालों को मुझे ऐसे हटाना है
रोज़ ग़म के दरिया में जैसे नहाना है
बंदिशों से हाथ ऐसे अब छुड़ाना है
पंछियों जैसे मुझे अब चहचहाना है
काम ख़ुद पे मैं करूँँगा देखना यारो
अब बुरी सब आदतों से बाज़ आना है
दरमियाँ रिश्तों के है दीवार आती दो
इक अना तो दूसरा रोना-रुलाना है
इक मुकम्मल जो ग़ज़ल ताज़ा हुई है कल
इसलिए फिर आपको अब बौखलाना है
मैंने फूलों की हिफ़ाज़त का लिया ज़िम्मा
रोज़ यानी आपने फिर आज़माना है
ज़िंदगी का इक यही दस्तूर है यारो
सामने सबके यहाँ हँसना-हँसाना है
टूटती उम्मीद हर दिन आपकी माना
पर ललित उम्मीद का इक आशियाना है
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