मदद के वास्ते जो हर घड़ी तय्यार मिलते हैं

बड़ी क़िस्मत से ही दुनिया में ऐसे यार मिलते हैं

मेरा उन दोस्तों से भी है याराना बड़ा गहरा
जो मुझ से साल में बस एक आधी बार मिलते हैं

हमारे शहर में कम है भले लोगों की अब तादाद
कि ढूँढो तो बड़ी मुश्किल से बस दो-चार मिलते हैं

कोई दरकार ले आई है हम तक आप को शायद
वगरना हम ग़रीबों से कहाँ सरकार मिलते हैं

निगाहें फेर लेते हैं ज़रा सी बात क्या बिगड़ी
ये अपने लोग जब हम से सर-ए-बाज़ार मिलते हैं

— MAHESH CHAUHAN NARNAULI

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