दीया बुझने से बचाता रहा
हाथ अपना मैं जलाता रहा
छोड़कर मजबूरियों में गई
मैं यही ख़ुद को बताता रहा
जो मुझे अपना समझते नहीं
हक़ उन्हीं पर मैं जताता रहा
ऐब मेरे जो गिनाते रहे
आइने उनको दिखाता रहा
रूठकर मुझ सेे गया एक शख़्स
'उम्र भर उसको मनाता रहा
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