कैसे तू इस दिल के अंदर आई थी
सब को पीछे छोड़ फर फर आई थी
एक दिन शर्मा गया था चाँद जब
खोल के ज़ुल्फ़ें वो छत पर आई थी
याद है वो दिन अभी भी मुझ को जब
साथ मेरे वो मेरे घर आई थी
मैं ने बोला मिलना है तुम से मुझे
फिर वो घर से अपने चुप कर आई थी
मैं बिछड़ के ठीक हूँ तुझ से मगर
याद तू भी मुझ को अक्सर आई थी
— Ammar 'yasir'















