मिलता हूँ उस से तो वो कुछ मुझ को अपना लगता है

क्या पता उस का ये मुझ से कैसा रिश्ता लगता है

ये नहीं मालूम साथी है या दुश्मन है मेरा
हाँ मगर इस कमरे में ही मुझ को अच्छा लगता है

कुछ अलग सी हरकतें करता हैं देखूँ जब उसे
वो मुझे हर वक़्त इक सपने में खोया लगता है

नींद आए भी तो सोता ही नहीं हूँ मैं कभी
ये समझ आया बिछड़ के उस से कैसा लगता है

देख कर उस को यूँ नज़रों को झुका लेता हूँ मैं
मुझ को उस को देखना भी कुछ बुरा सा लगता है

वो अगर ग़ुस्सा करे तो फिर मैं हँसने लगता हूँ
ग़ुस्से में भी कितना तो वो शख़्स प्यारा लगता है

— Ammar 'yasir'

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