मेरे भीतर टूटने जैसी सदा उठने लगी
ये गुज़िश्ता नेकी है या फिर वबा उठने लगी
वक़्त अपना काटता हूँ मैं बड़ी ख़ामोशी से
पर जहाँ में मैं बुरा हूँ ये हवा उठने लगी
जब बयाँ की इश्क़ में झेले ग़मों की दास्ताँ
फिर यहाँ हर एक महफ़िल मर्हबा उठने लगी
— Vikas Shah musafir















