जब कभी तैश में कमी आई
हर क़सम फिर क़सम रही आई
रहरव-ए-शौक़ जिस तरफ़ निकले
मौत बस रू-ब-रू चली आई
मसअला तुम पता करो जा कर
आज क्यूँ आग में नमी आई
सात ग़म पास रख लिए गिन के
ज़िंदगी याद ही नहीं आई
पूछ मत यार तू अभी हम से
आख़िरी बार कब हँसी आई
लफ़्ज़ मेरे लहू लुहान हुए
और आवाज़ भी दबी आई
— Nikhil Tiwari 'Nazeel'















