"बात वफ़ा की"
इम्तिहान–ए–इश्क़ में मेरे सब्र की और आज़माइश नहीं होगी
वो बे-वफ़ा ही सही दिल में किसी और की गुंजाइश नहीं होगी
मश्वराकार जो बैठे हैं रिश्ता बहाली के नुस्ख़े ले कर फ़रेबी
ब-ख़ूबी जानते हैं दर्द–ए–दिल की पैमाइश नहीं होगी
बज़्म–ए–जानाँ में मिल चुका है सभी को ख़िताब 'इश्क़िया
कलंदर हूँ मेरे ओहदे में अब और अफ़ज़ाइश नहीं होगी
एक दरिया रवाना है अपनी मौज में समुंदर की जानिब
क़ब्र मेरा मक़ाम है कि यहाँ अब रिहाइश नहीं होगी।
इक गुलाब बिछड़ने से बू–ए–चमन फ़ीकी नहीं पड़ती पर
मुझे यक़ीं है मेरे बा'द मेरी दुबारा से पैदाइश नहीं होगी














