फ़ैज़-ए-रइय्यत अग्र है ज़िल्ल-ए-इलाही के लिए
कीना ज़रा सा भी मुज़िर है बादशाही के लिए
दे कर पनाहें फिर हमारी बे-पनाही के लिए
तय्यार है दुनिया हमारी रू-सियाही के लिए
हम दोनों के घर एक ही रस्ते में हैं नज़दीक हैं
कोई सबब क्यूँ चाहिए फिर आवा-जाही के लिए
तुम क़त्ल करते जाना रफ़्ता-रफ़्ता मेरे प्यार का
इक मुस्कुराहट काफ़ी होगी बे-गुनाही के लिए
ग़म-ख़्वार तुम अच्छे नहीं अच्छी निभा लो दुश्मनी
मैं राज़ ज़ाहिर कर चुका मेरी तबाही के लिए
ये कैसे मुमकिन है कि मैं बर्बाद कर पाऊँ उसे
मैं ने दुआ माँगी थी जिस की ख़ैर-ख़्वाही के लिए
नख-सिख तुम्हारे हुस्न पर मैं ने लिखी ग़ज़लें कई
मशहूर होने के लिए और वाहवाही के लिए
ग़म हिज्र सहना सीखना ख़ल्वत में रहना सीखना
ये मशवरत है मंज़िल-ए-उल्फ़त के राही के लिए
दिल की रियासत क्या किसी जन्नत से कम होगी 'मिलन'
इक राज-रानी चाहिए इस क़स्र-ए-शाही के लिए















