इक़बाल-ए-मोहब्बत का अदना सा फ़साना है
माशूक़ हो या आशिक़ बस जान से जाना है
हम फूलों के दीवाने पत्थर का ज़माना है
शीशा तो नहीं लेकिन दिल टूट ही जाना है
भर जाता है मिलते ही हर ज़ख़्म नया मेरा
जो जान का दुश्मन है नासूर पुराना है
तुम जो नहीं तो दुनिया वीरान-सराए है
तुम हो तो मिरा आलम हर रुत में सुहाना है
हर जान के जीवन का अंजाम है मर जाना
आख़िर में महासागर नदियों का मुहाना है
अतफ़ाल सा सादापन औरत सी समझदारी
वो लड़की नहीं केवल अनमोल ख़ज़ाना है
बिल-वास्ता छुप-छुप कर हम इश्क़ नहीं करते
जिस ओर निगाहें हैं उस ओर निशाना है
— Milan Gautam















