अपना मैं क्यूँँ न समझूँ मेरे हबीब तुम हो
रिश्ता है ये पुराना पिछला नसीब तुम हो
कहने को यूँ तो मुझ से तुम ख़ूब दूर लेकिन
कोई नहीं है उतना जितने क़रीब तुम हो
बरसों से आशिक़ी का तन्हा मरीज़ हूँ मैं
हालत सुधर रही है दिल के तबीब तुम हो
तुम बात-बात पर जो लेते हो नाम उस का
अक्सर मुझे है लगता मेरे रक़ीब तुम हो
झेले हैं दर्द लाखों उफ़ की नहीं ज़रा सी
कैसे कहे न कोई मालिक अजीब तुम हो
दामन से मैं ने अपने बिखरा दिया उजाला
सब देख कर ये हुलिया बोले ग़रीब तुम हो
यूँ तो मुझे गिला है अपनी ही ज़िंदगी से
इतनी सी बस ख़ुशी है मेरा नसीब तुम हो
— Prashant Prakhar















