ऊँची तो आसमान से दिल की उड़ान है
लेकिन मेरे ख़िलाफ़ ये सारा जहान है
मुझ को वफ़ा के तौर-तरीक़े नहीं पता
जिन की ख़ता मुआफ़ की उन का बयान है
कोई कसर न रह गई बाक़ी दहेज़ में
बेटी विदा तो हो गई गिरवी मकान है
अब तो मुझे यक़ीन है बदलेंगी पीढियाँ
ये गाँव में किताब की पहली दुकान है
रोटी में अस्ल स्वाद तो आता यूँ ही नहीं
मेहनत की भीनी आँच पे पकता किसान है
— Prashant Prakhar















