हमें आदत बुरी है ग़म छिपाने की
मगर कोशिश बहुत की है बताने की
उसे अपनी कहानी जो सुनाता मैं
उसे लगती फ़लाने की फ़लाने की
बड़ी रग़बत है उसके ग़म से मुझको तो
ज़रूरत ही नहीं उसको भुलाने की
किसी के ग़म किसी की बद्दुआ में हूँ
मुझे अब क्या ज़रूरत आशियाने की
मेरा पैकर मुझे अब छोड़ ही देगा
बहुत साज़िश हुई मुझको सुलाने की
बड़ा था नाज़ तुमको ‘आब’ यारों पे
बड़ी क़ीमत चुकाई दोस्ताने की
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