हमें आदत बुरी है ग़म छिपाने की
मगर कोशिश बहुत की है बताने की
उसे अपनी कहानी जो सुनाता मैं
उसे लगती फ़लाने की फ़लाने की
बड़ी रग़बत है उस के ग़म से मुझ को तो
ज़रूरत ही नहीं उस को भुलाने की
किसी के ग़म किसी की बद-दुआ में हूँ
मुझे अब क्या ज़रूरत आशियाने की
मेरा पैकर मुझे अब छोड़ ही देगा
बहुत साज़िश हुई मुझ को सुलाने की
बड़ा था नाज़ तुम को ‘आब’ यारों पे
बड़ी क़ीमत चुकाई दोस्ताने की
— Piyush Mishra 'Aab'















