ढल रहा हूँ मैं शाम हो जैसे
दर्द अब बेलगाम हो जैसे
आज मेरी ख़ुशी में ख़ुश है वो
ग़म मेरा तल्ख़-काम हो जैसे
जुस्तजू भी रही नहीं मुझ
में
उम्र सारी तमाम हो जैसे
हाँ में हाँ वो मिला रहा ऐसे
वो मेरा हमकलाम हो जैसे
आज तो ख़ूब हो रही ख़ातिर
आज सब इन्तिज़ाम हो जैसे
क्या कहूँ कुछ समझ नहीं आता
मुँह में मेरे लगाम हो जैसे
दाँव मुझ पर लगा रहा है वो
‘आब’ उस का ग़ुलाम हो जैसे
— Piyush Mishra 'Aab'















