ये शायरी जीना मुझे सिखला गई
इक खेल है ये आशिक़ी समझा गई
मैं फिर रहा था मौत अपनी ढूँढते
फिर ज़िंदगी मुझ सेे कहीं टकरा गई
उसने मुझे लूटा तो कैसा ग़म मुझे
पर बे-दिली उसकी मुझे चौंका गई
प्यारे मेरे जो थे सितारे बन गए
जो बच गए ये रात उनको खा गई
थे चाहने वाले तुम्हें ढेरों मगर
उनकी मुहब्बत से भी तुम उकता गई
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