"तेरे जाने के बा'द"

गुज़िश्ता शब फिर तेरी सरगोशियों के साए
मेरे ख़्वाबों के बियाबाँ में लहराते रहे
फिर तेरी खामोशियों के तरन्नुम में गुम
बाम -ए- फ़लक पे रक़्स करता रहा मैं
गिरते रहे फिर मोहब्बत के फ़साने
क़तरा क़तरा तेरी नज़र -ए-नीम-बाज़ से
फिर तेरे आफताब-ए-जमाल से जल गया मैं
बहर -ए- ख़ुदा तेरे रुख पे जुल्फ़ का पर्दा रहे
कब तक ख़यालों की बज़्म में हो तेरा दीदार
लाज़िम है मुस्तकबिल मेरा फ़िराक़ में बने?
रोज़-ए-वस्ल की उम्मीद ने दीवाना कर दिया
इस क़फ़स से कोई ग़म-गुसार अब रिहा करे

— Pawan Kumar

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Nazar Shayari

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